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Saturday, October 3, 2015

नींद भी तुम्हारे जैसी हो गयी...

इतने दिनों के बाद,
आज फिर खिचड़ी मंगवा के खाई।
आज फिर भागते -भागते देर से पहुंची सिनेमा देखने।

आज फिर अकेले मे,
दो बार 'स्टुपिड' बोल के,
मैंने कोशिश की उच्चारण की उन गलतियों को समझने की,
जो सिर्फ तुम समझते थे,

आज फिर नींद भी,
तुम्हारे जैसी हो गयी,

क्योकि,
आज फिर तुम्हारा वो खत मिल गया,
जो तुमने कभी लिखा ही नहीं…


Thursday, October 1, 2015

अब भी वैसा ही हूँ मैं

 जैसे तुम्हे उठा कर,
सो जाता था,
क्या अब भी
कोई  उठाता है तुम्हे?
क्या अब भी
उसके न उठाने पर
गुस्सा करती हो ?
वैसे ही झगड़ती हो ?

ऐसी ही एक सुबह तुमने
नींद मे ही मझे
एक कहानी सुनाई थी
क्या अब भी कोई सुनता है
जैसे मैंने सुनी थी ?


क्या अब भी तुम्हें…

अगर हाँ
तो भूल जाना मझे
'इग्नोर' कर देना

क्योंकि
 बदलना सिख नहीं पाया
अब भी वैसा ही हूँ मैं     

Monday, July 13, 2015

"बात तो सिर्फ देखने की हुई थी"

"बात तो सिर्फ देखने की हुई थी", एकदम निश्छल मासूमियत पर बच्चो सी संजीदगी से, कहा था उन्होंने।
फिर अपनी गर्दन घुमाई। दोनों की नजरें मिलीं और दोनों मूस्कुरा दिए। बस मुस्कुरायें कहा कुछ भी नहीं और ढेर सारी बातें कर ली।
बात बस इतनी सी थी की उनसे प्यार कर रहे थे। उनकी पीठ बड़ी प्यारी लगती थी हमे। कह दिया देखना है। दिखा दिया उन्होंने ठीक वैसे ही जैसे कोई बच्ची अपनी गुड़ियों का बक्सा दिखाती हो। करीब चले गए उनके। 
बस उन्होंने अपनी भोली सी सूरत बना कर कह दिया की ,"बात तो सिर्फ देखने की हुई थी"।
बहुत ही मामूली सी बात है पर शायद प्रेम इन्ही छोटी छोटी बातों मे छुपा होता है। पता नहीं कैसा होता है ये प्रेम पर लगता है की ऐसी ही अनुभुती को प्रेम कहते हैं जैसा मझे उनकी ये बात सुनकर हुई थी।
पीठ शायद उतनी याद नहीं। ये बात शायद उनको याद भी न हो।
पर आज हमें भले उस प्यारी सी पीठ को याद करने मे दिमाग खपाना पड़े पर जब भी प्रेम जैसी कोई अनुभूति होती है, मैं फिर से सुन लेता हूँ, "बात तो सिर्फ देखने की हुई थी" और हौले से मुस्कुरा देता हूँ।
(based on experiences of Sukhen Da read more at recklesspen.blogspot.in/2014/09/sukhen-das-quest-for-love.html?m=1)

Tuesday, July 29, 2014

उस दिन...

उस दिन,
उस गरीब को जब कैंसर हुआ,
पता था उसे,
बस पता भर था,
वो ला-इलाज नहीं,
पर वो तो टि बी होने पर भी
मर जाता।
उस दिन,
उसे जब पहली बार,
प्रेम किया था,
खुब रोई थी मैं।
उस दिन,
जब मैंने बालों मे कंघी की थी,
पहली और 'शायद' आखरी बार,
पता है मझे,
वो यक़ीनन आखिरी था,
पर फिर ये  'शायद' क्यों ?
उस दिन,
उसे जब पहली बार,
प्रेम किया था,
खुब रोई थी मैं।

Saturday, December 28, 2013

अनायास (Effortless)

नहीं तैयार होता था वो मेरे लिए,
कभी रूठी जो मैं,
तो मनाता भी नहीं था,
न खुद के रूठने पर,
मेरे मानाने का इंतज़ार करता  था
न मैं उसे प्यार  'करती थी,
न वो  मुझे प्यार करता था,
असल मे,
हम कुछ भी नहीं 'करते' थे,
एक दूसरे के लिए,
पर,
अनायास ही,
सब हो जाता था. 



Thursday, November 1, 2012

पार्क



आज इस रोगग्रस्त संझा
पार्क के एक कोने
इस दिन भर तपे पत्थर पर बैठकर
सोचता हूँ मैं
कि तुमने अच्छा नहीं किया


सोचता हूँ मैं
कि स्थिति परिवर्तन यही होता है शायद
कि तुम ब्राह्मण हो गए और मैं दलित


तुम्हारे प्रेम ने इतना बदला मुझको
कि अभी-अभी पार्क में आई एक युवती
मुझे कितनी सहज लग रही थी
मेरे यहाँ होने की तरह सहज


सामने एक घांस के गुच्छे को घूरता मैं देर तक
सोचता हूँ 'उत्पादकता के सिद्धांत' पर
और दूसरे ही पल
अपने पैंट पर गिरे

एक तृण को झाड़ते हुए
अपने उपभोग के बारे में

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं !!

ये उसी शहर का एक पार्क है
जिस शहर में
मैं तुमसे पहली बार मिला था

इसी शहर में गुजारी थी
मैंने अपनी पूरी जिंदगी के सामानांतर
मात्र एक शाम

जब पूरा आसमान पीला पड़ गया था
और बारिश की झिर्रियाँ
ज़मीन पर गिरने से पहले हवा में उड़ रही थीं

तब मैं यह मानकर बैठा था
कि तुम्हीं मेरा अंतिम प्रेम होगे
और तुम्हें याद नहीं होगा शायद

तुमने भी आसमान की ओर देखते हुए कहा था
'आई एम थैंकिंग गाड दैट ही मेड यू फॉर मी'

तब ज़रूर तुम्हारा ईश्वर मुझपर हंस रहा होगा
हालांकि मैं ईश्वर को नहीं मानता
पर तुम्हारा ईश्वर साक्षी है
कि कैसे बदल ली तुमने अपनी भाषा
और अब तुमको वही शाम एक 'भावनात्मक त्रुटि' नज़र आती है

तुमने कैसे मेरी ढेर सारी स्थितियों को
मुट्ठी भर चिलबिल की तरह
मसल कर फूंक दिया
और मैं कुछ न कर सका।

कभी-कभी लगता है कि तुम्हारा एक पूर्व नियोजित क्रम था
कभी-कभी ये भी लगता है
कि तुमने मुझे अपना "सेफ्टी वाल्व" समझा

एक बार ये भी लगता है
कि तुम मुझ जैसे ही किसी व्यक्ति से ही प्रेम करना चाहती थीं
और मेरी जात के प्रेमियों का एक हिस्सा
जो दिखता नहीं है
और जो दिखाया भी नहीं जा सकता
उसे तुम पचा नहीं पाए

अक्सर ये भी लगता है कि
कहीं न कहीं तुम्हारे सामने
अस्तित्व का घोर संकट आता रहा
जो पहले कभी नहीं आया था
हालांकि आरम्भ में तो वह सुखद था
पर बाद में तुम घबराने लगे
असल में तुम्हारे अन्दर के विद्रोह ने
मुझसे प्रेम कर किया
और मैं अभागा तुम्हारे विद्रोह का शिकार
उसे तुम्हारा स्वीकार्य, समर्पण समझ बैठा


इसी पार्क में अपने दाहिने तरफ
उस जामुन के पेड़ को देखता हूँ
तो सोचता हूँ कि तुमने अच्छा पाठ पढाया मुझको
कि अगर उस जामुन के पेड़ पर 'ऊपर' चढ़ना हो
तो जिस डाल पे हाथ रक्खा है

उसपे पाँव तो रखना ही होगा
मगर अफ़सोस मैं वो सीख ही नहीं पाया
और अब भी उसी पहली डाल पर बैठा हूँ


कि मैं कुछ कहना भी चाहूँ
तो मेरे एक भी शब्द तुम तक नहीं पहुँच पाते
और तुम कहीं भी थूकते हो
तो एकाध छींटे
मुझपर पड़ ही जातीं हैं

तुमने विकास के कितने अच्छे-अच्छे तर्क गढ़े हैं
और मैं अविकसित, पिछड़ा
"स्माल इज ब्यूटीफुल" वाले तर्क को लिए बैठा हूँ

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं

एक लम्बी सांस लेता हूँ
नथुनों की गर्मी महसूस करता हूँ
उँगलियों के बीच पसीने को पोंछता हूँ
न जाने क्या हथेली में सूंघता हूँ
उंगलीके एक नाख़ून की फेंच बहुत ध्यान से देखता हूँ

अब सोचता हूँ
कि क्या जो कुछ भी तुम्हारे बारे में लिखा मैंने
और सोचा भी
वो तुम भी सोचते होगे
अगर नहीं तो ये सब महज़ आरोप है
सपाट निंदा है
जिसकी अनुभूति मात्र ही
मुझे निर्जन, गहरे, जलहीन कुँए में फेंक देती है
और मेरी आवाज़, शब्द
उस निर्जनता का सौन्दर्य बनकर रह जाती है
जितना ही मैं तुम्हारे बारे मैं सोचता हूँ
उतना निर्वासित होता जाता हूँ
इस बाज़ार से
उतना समझ पाता हूँ
उस मर्दानगी को
छान पाता हूँ खुद को
फिर बटोर लेता हूँ

ताकि मैं बिकाऊ न रह सकूँ
ताकि मेरा कोई मूल्य न हो

बाज़ार के हाथ कितने लम्बे होते हैं।------रितेष मिश्रा

(This is a beautiful poem written by Ritesh Mishra, a journalist by profession but poet at heart....)

Saturday, September 22, 2012

सुनो......

बहुत बोलता हूँ,
क्योकि उसे पसंद है,
सुनना नहीं,
बहुत बोलने वाले लोग,
पर इस कहने-सुनने के शोरगुल में,
अकसर,
Taken from google
चुप ही पाया जाता हूँ मैं,
या,

चुप करा देता है,
उसका, 'कीमती हेडफोन',
और,


मै बोल नहीं पाता।


Wednesday, June 27, 2012

फटा नोट...

जानता हूँ उसे,
सहेज के रखेगी,
वो मुझे फेंक नहीं पायेगी,
पर मैं खर्च भी नहीं हो सकता,
क्योंकि,
उसके बटुए में पड़ा,
मैं सबसे बड़ा, नोट हूँ,
पर फटा हुआ...
.

Thursday, April 21, 2011

फिर खोया हमने...

आज मेरा कुछ खो गया है

कल भी खो गयी थी
वो तुम्हारी काली कलम
तुम्हारी कह रही हूँ
पर जब खोई थी
तब वो मेरी थी
तुम्हारी कह रही हूँ,
क्योकि उसे खोने से लेकर अब तक भी बहुत कुछ खो गया है मेरा

अक्सर मेरी चीज़ें खो जाती है,
तभी तो दे देती  थी
तुम्हे अपने सारे जरुरी कागज़
सहेज लेते थे तुम
उन्हें भी और शायद मुझे भी
या मैं ऐसा सोचती था
पर तुम भी तो नहीं सहेज पाए  
मेरी सबसे प्यारी चीज़
....और अब मैं तुम्हारी उस काली कलम
को अपनी नहीं कह पाऊँगी . 

Friday, February 18, 2011

एक बहुत छोटी सी चिड़िया, भ्रम और भ्रम


(ये मेरे एक बड़े भाई तुल्य कवि की रचना है, यहाँ मैं कवि कह ले रहा हुईं क्योकि उनका नाम, उनके कहने पर नहीं दे पाया वरना वो इसके लिए भी मना कर देते, कविता कुछ ऐसी है की मैंने जब एक बार पढ़ी तो दोबारा, दोबारा पढ़ी तो फिर एक बार पढने का मन किया, हर बार एक नया अर्थ ले कर आती है)

चतुर कोई नहीं था 
न पेड़ 
न चिड़िया 
बस दोनों को भ्रम था 
की किसी दिन
उनमे से कोई एक 
चतुर न हो जाये 

फिर किसी एक दिन 
जब उनमे से कोई चतुर हो गया 
तब दूसरे  का कुछ और टूटा 
जो कभी जोड़ा नहीं जा सकेगा 
भ्रम बना रहेगा  वैसे ही  

अब  चिड़िया और पेड़ की कहानी 
कुछ  दूसरी  तरह से कही जाने लगी

चिड़ियाँ अब शाम को घर नहीं  आयेंगी 
और दिन में जमीन पे लोटती मिलेंगी  


Monday, January 24, 2011

जब तुम्हे प्यार कर रहा होता हूँ....

आधार मिलता ही नहीं,
तुम्हारी रेशमी जमीन पर,
फिसलती  हूँ,
तैरती  हूँ,
तुम्हारे,
ऊपर,
जब तुम्हे प्यार कर रही होती हूँ,
बादल बन जाती हूँ....
(ये एक अधूरी कविता है, पड़ी रही, रुकी रही, सायद रुकी ही रह जाए)

Thursday, January 6, 2011

...पर तुम चली गयी

उस दिन जब मैं रूठ गया था,
मैं रुक गया था,
आज भी रुका हूँ,
एक छोटे से स्टेशन की तरह,
सोचा था,
तुम आओगी,
मनाओगी,
और मैं मान जाऊंगा,
और तुम आई भी थी,
पर तुम चली गयी.

कैसे रोकता,
कैसे रूकती,
राजधानी थी तुम,
और, मैं एक छोटा सा स्टेशन.

आंधी सी आ रही थी तुम,
क्या करता, कुछ भी तो नहीं था मेरे पास,
पटरियों पर बिछा दी, यादें,
उस दुर्घटना की,
जब तुम रुकी थीं,
इस छोटे से हाल्ट पर,
सोचा सायद तुम्हे दिख जाये,
और तुम......
पर तुम चली गयी.

कैसे रूकती,
कैसे रोकता,
राजधानी थी तुम,
और, मैं एक छोटा सा स्टेशन.

Tuesday, December 7, 2010

तीसरे पन्ने पर पड़ा तुम्हारा चुम्बन

पन्ने पलट रहा था,
तुम्हारी यादों के,
बहुत सारी थीं,
फिर भी ढूँढ़ रहा था,
तुम्हारी ज्यादतियां,
अभी तीसरा पन्ना ही पलटा था,
की तुम्हारा चुम्बन मिल गया,
किताब बंद हो गयी,
कहीं दूर से तुम्हारे हसने की आवाज़ आई,
हँस रही थी तुम,
मेरी बेबसी पर,
और अच्छा लग रहा था मुझे,
तुम्हारा यूँ खिलखिला के हँसना.

Saturday, October 23, 2010

एक इ-मेल

पिछले दिनों तुम्हे एक मेल किया था,


आज फिर कर रहा हूँ,

पिछले मेल का जवाब नहीं आया,

रोज एक आस के साथ,

मेल देखता था,

की तुम्हारा जवाब होगा,

'इन्बोक्स' खुलते ही उम्मीद ढेह जाती थी,

एहसास वही होता जैसे प्रेम के

तूफान के शांत होने पर होता है,

पर शायद इस 'लॉग इन' से,

'इन्बोक्स' के खुलने के सफ़र में,

इस प्रेम के चरम तक पहुचने के पहले के, 'फॉर प्ले' में,

मजा आने लगा है,

इन दस दिनों में जवाब की उम्मीद जा रही थी,

इसलिए आज फिर कर रहा हूँ,

तुम्हारा जवाब नहीं जवाब की,

आश को पाने के लिए.................

Friday, October 15, 2010

मत आओ तुम

तुम्हारा नहीं आना,

सालता रहा,

तुम्हारे आने की खबर से,

एक द्वन्द है,

आज आओगी,

तुमने नहीं बताया,

कोई बता रहा था,

आज सीढियां चढ़ते हुए,

मना रहा हूँ मैं,

काश! तुम न आओ,

क्यूंकि,

तुम्हारी कुर्सी के खालीपन में,

तुम्हारे न होने में,

लगता है की कुछ है,

कोई मेरा है,

जो यहाँ नहीं है,

तुम्हारे आने से,

मेरा भ्रम टूट जायेगा...

Monday, October 11, 2010

वो बोल नहीं पाता

आज  मैं  बोलूँगा ’, सोचा  उसने
पर,
जब  राह  चलते  एक  अदने  से  सिपाही  ने ,
उसे  गाली  दी ,
जब  रेलवे  के  टिकेट  क्लर्क  ने ,
घंटो   लाइन  में  रहने  के  बाद ,
छुट्टे  पैसों  के  लिए  उसे ,
बिना  टिकेट  लौटा  दिया ,
जब  उसकी  प्रेमिका  ने  उसे ,
अपने  किसी  ‘गहरे ’ दोस्त   से  मिलवाया ,
हमेशा  की  तरह ,
वो  आज  भी  कुछ ,
बोल  नहीं  पाया …..

Sunday, October 3, 2010

उसका प्यार.....?

वो मुझे सचमें बहुत प्यार करती है,
जब कभी मेरे पास होती है (कभी-कभी ही सही)
मैं उसे छू सकता हूँ,
चूम सकता हूँ,
प्यार कर सकता हूँ,
हाँ सच में,
उसे नहीं, उसका मोबाइल छूना वर्जित है,
मेरे लिए......

Thursday, January 14, 2010

भीड़ में बसने वाली तन्हाई

छूता जरुर है मुझे,
तुम्हारा चुम्बन,
कर नहीं पता उत्पान्न,
कोई स्पंदन,
मेरी हो कर भी तुम,
मेरी कहाँ रह जाती,
फिसल जाता है कुछ,
भूल जाता हुईं मैं,
रोज़ गुजरने वाले, रास्तों में ,
पड़ने वाली दुकानों के नामों की तरह,
बस यहीं से,
'मेरी' और 'मेरे' से 'मैं' अलग हो जाता है,
एकदम तनहा,
प्रेम या विरह की उर्जा लिए,
ये एकांत की तन्हाई नहीं है ,
ये तो मेरी और तुम्हारी नजदीकियों के बीच,
में अंतहीन फैलाव लिए  पसरी,
भीड़ में बसने वाली तन्हाई है.

Tuesday, December 15, 2009

वो जागती रातें.......

सर्द हवा ने पत्तों को चूमा जब ,
हुयी ऐसी सनसनाहट
कान गुदगुदा उठे लगा जैसे
हो तुम्हारी आहट।
ये ठंडी हवा कुछ गुनगुनायी
फिर हमसे यूँ टकराई वो ,
लगा जैसे तुम्हारी गीली जुल्फों
को चुकार आई हो
इन बहती हवाओं में
खुसबू उमर रही थी ऐसे
वो खुसबू में डूबा कोई ख़त,
पढ़ रही हो जैसे।
तभी बरस परा आसमान
मेरी आँखों के जैसा
कुचला गया वो समां
मेरी जसज्बतों के जैसा
याद आई वो जगती रातें
गुजारी थी हमने जो रो रो के
दिल से आह निकली अचानक
की कास तुम बेवफा न होते .....
Posted on by Bakait in ,

Saturday, August 8, 2009

गरीब



समुद्र किनारे एक भिखारी दिन में काला चस्मा लगाये बैठा था ,
ख़ुद को अन्धो की तरह सजाये बैठा था ,
नित नए बहाने किए जा रहा था,
हर आने जाने वाला कुछ न कुछ दिए जा रहा था ,
तभी बिकनी पहने एक कन्या गुजरी ,
जिससे कुछ न माँगा उसने ,
जब न मांगने का कारन पूछा हमने ,
बोला "जिसके पास तन ढकने को कपड़े तक नही ,
उस गरीब से मांगने का मुझको कोई हक नही ।"
Posted on by Bakait in