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Sunday, September 14, 2014

हर किरदार में समाई हैं कहानियां


महेन्द्र गुप्ता
‘फाइंडिंग फैनी’ अपने प्रेम काे खोजने निकले पांच अधूरे और अनसुलझे लोगों की यात्रा है। दर्शकों को इस कहानी का रहस्य इन किरदारों के जीवन में ही तलाशना होता है। इस सफर में फर्डी (नसीरुद्दीन शाह) अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में अपने 46 साल पुराने प्रेम काे खोजने निकलता है। उसे भरोसा है कि उसे उसकी प्रेमिका फैनी जरूर मिलेगी। इस सफर में उसका साथ देती है एंजी (दीपिका पादुकोण)। दरअसल, एंजी फर्डी के साथ इसलिए है, क्योंकि वह सेवियो (अर्जुन कपूर) को चाहती थी, लेकिन उसने कभी अपने प्रेम का उससे इजहार नहीं किया था। अंतत: उसने किसी और से शादी कर ली, लेकिन शादी के दिन ही एंजी विधवा हो गई।
इस यात्रा में एंजी की सास रोजी (डिंपल कपाड़िया) भी साथ है और उसके प्रेम का मारा एक चित्रकार पेड्रो (पंकज कपूर) भी। इस तरह यह किरदार फर्डी के प्रेम की तलाश में अपने प्रेम को तलाशते हैं, जिसमें वे खुद को अभिमानी, स्वार्थी और अधूरा पाते हैं। फिल्म में हास्य को बड़े स्वभाविक ढंग से पैदा किया गया है। यही बात सबसे अिधक सुकून देने वाली है।


चित्रकार पेड्रो हमेशा से चाहता है कि वह रोजी की पेंटिंग बनाए, लेकिन जब पेंटिंग बनाने का मौका आता है तो उसे पता चलता है कि बाहर से आकर्षक दिखने वाली रोजी अंदर से कितनी खोखली है। वह कहता है कि उसे इस पेंटिंग बनाने में सबसे ज्यादा कठिनाई उसकी आंखें बनाने में हुई, क्योंकि उन आंखों में कुछ है ही नहीं। उजड़ी और बेजान हैं यह। सिर्फ स्वार्थ और झूठा गुरूर है इनमें। दरअसल, रोजी का पति उसे छोड़कर भाग गया था। यह बात सिर्फ फर्डी जानता है। रोजी एक लोभी और सांसारिक चीजों में यकीन करने वाली महिला है। अपने पति के जाने के बाद उसकी उम्मीद बंधती है कि पेड्रो उसे उसका प्रेम देगा, लेकिन वह भी रोजी को नकार देता है। अंतत: पेड्रो के मौत के साथ उसकी यह उम्मीद भी मर जाती है।


इस कहानी में दो खूबसूरत किरदार और हैं एक गोवा का पोकोलिन गांव और दूसरा रोजी की बिल्ली। दोनों का ही इस कहानी में अपना महत्व है। इस फिल्म के मजमून को समझने के लिए थोड़े धैर्य की जरूरत है। बात उतनी सीधी और गंभीर नहीं है, जितनी दर्शकों को लगती है, लेकिन फिर भी यह फिल्म कुछ खास है। यूं ही, अनायास। फिल्म की कोई कहानी नहीं, फिर भी हर किरदार में कहानियां समाई हैं।


अंतत: फर्टी की फैनी कहीं नहीं मिलती, वह रोजी से शादी कर लेता है। उधर, एंजी और सेवियो शादी कर लेते हैं। निर्देशक का कहना है कि प्रेम नहीं, लोग मरते हैं। वाकई प्रेम तो एक अहसास है और अहसास की कोई उम्र नहीं होती। कोई रंग-रूप और आकार नहीं होता। फिल्म का संगीत और कैमरा की स्वभाविक चाल प्रभावी है।


पुनश्च:

निर्देशक ने इस फिल्म को दिग्गज अभिनेताओं के कंधों पर रखकर दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है, क्योंकि वह जानता है कि उसके किरदार ही उसकी कहानी के साथ न्याय करेंगे। उसे पता है कि गहरी बातें कहने के लिए भी हल्के आसरे और समर्थ चेहरों की जरूरत होती है।

Thursday, September 11, 2014

पहले मेडल के लिए जिंदगी दांव पर लगाओ, फिर जिंदगी के लिए मेडल



महेन्द्र गुप्ता


फिल्म देखने के 15 मिनट बाद ही मेरा यह पूर्वाग्रह खत्म हो गया कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट विकिपीडिया पर मैरी कॉम के बारे में उपलब्ध जानकारी पर आधारित होगी। दरअसल, इसमें उस मैरी कॉम को दिखाया गया है, जो कैमरे की नजर से गढ़ी गई है। घटनाएं, पृष्ठभूमि और रिश्तों का ताना-बाना भले ही मैरी कॉम के जीवन से प्रेरित हो, लेकिन प्रियंका चोपड़ा की अदाकारी दर्शकों को एक अलग ही मैरी कॉम से मिलाती है। इस मैरी कॉम को देखे बिना उस मैरी कॉम तक पहुंचना मुश्किल होगा।

भले ही मैरी का जीवन संघर्षों से भरा रहा हो या वे ऐसे क्षेत्र से हों, जो सिर्फ कागजों में भारत है। फिर भी न किसी का संघर्ष मात्र सिनेमा हो सकता है, न भौगोलिक स्थितियों से उपजा भेदभाव और न कोई खेल। यह तो ‘मैरी कॉम’ नाम का एक ऐसा सिनेमाई सम्मिश्रण है, जिसमें थोड़ी मणिपुर में लागू आफ्सपा कानून की झलक (फिल्म का पहला सीन), थोड़ी मणिपुरी नृत्य की थाप, थोड़ा ‘पड़ा’ को ‘परा’ कहने वाली भाषा का माधुर्य और इन सबके केंद्र में सिमटा मैरी कॉम के संघर्ष और जज्बे का वो काढ़ा, जिसे बिना धोखे के किसी दर्शक को पिलाया ही नहीं जा सकता। इसका अहसास ही फिल्म का मूल है।

मैरी कॉम की कहानी को इस संदर्भ में याद करना भी बुरा नहीं होगा कि एक सफल महिला के पीछे कहीं न कहीं दो पुरुषों का हाथ भी है। मैरी के सफर की मुश्किलें मिटाने में उनके पति ओनलर और कोच ने भी कसर नहीं छोड़ी। मैरी कॉम नाम की यह गाड़ी स्त्री और पुरुष रूपी पहियों के संतुलन पर टिकी है। मनुष्य द्वारा रचे श्रेष्ठ कीर्तिमानों का यह भी एक महत्वपूर्ण आधार है।

किसी फिल्मकार को मैरी पर फिल्म बनाने का विचार सिर्फ यही सोचकर आ सकता है कि किस तरह एक महिला दो बच्चों की परवरिश करते हुए बॉक्सिंग रिंग पर विजयी अभिवादन करने में कामयाब हुई होगी। लेकिन किसी फिल्मकार के लिए इस फिल्म को बेचना उतना ही कठिन होता, जिनता कि यह सोचना सरल है। भारतीय िसनेमाई सौंदर्य के जनक संजय लीला भंसाली इन दोनों ही कला में पारंगत हंै।
साथ ही कोई दर्शक फेडरेशन के एथलीट्स के प्रति भेदभावपूर्ण और उनके सुविधाओं के नाम पर ठेंका दिखाने वाले रवैये पर विचार किए बिना भी नहीं रह सकता। हमारे खेल फेडरेशन्स की हकीकत सिर्फ फिल्म के इस एक संवाद में निहित है कि ‘पहले मेडल के लिए जिंदगी दांव पर लगाओ, फिर जिंदगी के लिए मेडल’।

प्रियंका चोपड़ा और उनके मेकअप आर्टिस्ट के हुनर की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम। इस फिल्म ने साबित किया है कि भले ही खेल फेडरेशन अपना धर्म भूल गए हों, लेकिन सिनेमा अपना धर्म नहीं भूला है।


Sunday, September 7, 2014

सिंघम रिटर्न्स: हवा में गोलियां और जमीं पर सामजिक सरोकार




महेंद्र  गुप्ता

Taken from google
एक्शन फिल्मों की वही पारंपरिक कहानी बताकर राेहित शेट्‌टी काे चलता कर देना इस बार मुश्किल होगा। फिल्म में हवाओं में कार और गोलियां उड़ाने के साथ-साथ उन्होंने अपनी कहानी को मानवीयता का एक धरातल भी दिया है, जिसमें एक शहीद ईमानदार पुलिसकर्मी का गरीब परिवार है, कई ईमानदार राजनेता हैं और वो जनता जो लोकतंत्र से ज्यादा उसे दो-चार हजार रुपए के लिए नीलाम करके अपने पेट पालने को मजबूर है। िफल्म का एक डायलॉग बड़ा असर डालता है कि इस देश की आधे से अधिक आबादी ऐसी है जिसे यह चिंता नहीं कि सरकार पांच साल चलेगी या नहीं, लेकिन यह चिंता है कि उसका घर कैसे चलेगा।

रोहित शेट्‌टी ने इस बार दर्शकों को िथएटर के बाहर भी िफल्म की स्मृतियां ले जाने का मौका दिया है। हालांकि, हो वहीं रहा है जो उनकी कहानी में होता आया है, लेकिन अलग ढंग से। मसलन, हफ्ता वसूलने वाले किसी गुंडे की जगह उन्होंने एक ढोंगी बाबा को दिखाया है, पुलिस को उसकी वर्दी से ज्यादा बिना वर्दी में पॉवरफुल दिखाया। सच भी है। किताबी कानून से ज्यादा आज देश को अपने विवेक के कानून और न्याय की जरूरत है। जो न किसी अपराधी को सालों तक जेल की रोटियां तोड़ने का मौका दे और न ईमानदारी को दीन-हीन और बौना साबित करे। िफल्म में बार-बार पुलिस की बेबसी और व्यवस्था पर चोट करने में िनर्देशक सफल हैं। साथ ही उन्होंने मीडिया को भी लपेटे में ले लिया है, जो समाज के पीछे अच्छे और बुरे दोनों तरह के चरित्र के साथ खड़ा है।
अच्छी बात यह है कि यह िफल्म दर्शकों का फाइटिंग, स्टंट और कारों को राखकर मनोरंजन की रस्म पूरी करती है तो यह सोचने की गुंजाइश भी पैदा करती है कि आखिर आज के ढोंगी धर्मगुरुओं के भक्त कौन हैं? भ्रष्ट नेताओं को किसने चुना? पुलिस अफसरों को रिश्वत किसने दी? और अन्याय के खिलाफ चुप कौन रहा? शायद, हॉल में बैठे वही चेहरे, जिन्हें हर बार उनकी सिनेमाई खुराक में सामाजिक चेतना का चूरन मिला के दिया जाता है, लेकिन वह घर लौटते-लौटते ही बेअसर हो जाता है।
बाबा के वेश में अमोल गुप्ते की एक्टिंग और बीच-बीच में कॉमेडी के हल्के डोज आपके ढाई घंटों को और अधिक मजेदार बना देंगे। अंतत: सिंघम रिटर्न्स को रोहित शेट्‌टी का गुड रिटर्न्स कहा जा सकता है।