Thursday, September 11, 2014

पहले मेडल के लिए जिंदगी दांव पर लगाओ, फिर जिंदगी के लिए मेडल



महेन्द्र गुप्ता


फिल्म देखने के 15 मिनट बाद ही मेरा यह पूर्वाग्रह खत्म हो गया कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट विकिपीडिया पर मैरी कॉम के बारे में उपलब्ध जानकारी पर आधारित होगी। दरअसल, इसमें उस मैरी कॉम को दिखाया गया है, जो कैमरे की नजर से गढ़ी गई है। घटनाएं, पृष्ठभूमि और रिश्तों का ताना-बाना भले ही मैरी कॉम के जीवन से प्रेरित हो, लेकिन प्रियंका चोपड़ा की अदाकारी दर्शकों को एक अलग ही मैरी कॉम से मिलाती है। इस मैरी कॉम को देखे बिना उस मैरी कॉम तक पहुंचना मुश्किल होगा।

भले ही मैरी का जीवन संघर्षों से भरा रहा हो या वे ऐसे क्षेत्र से हों, जो सिर्फ कागजों में भारत है। फिर भी न किसी का संघर्ष मात्र सिनेमा हो सकता है, न भौगोलिक स्थितियों से उपजा भेदभाव और न कोई खेल। यह तो ‘मैरी कॉम’ नाम का एक ऐसा सिनेमाई सम्मिश्रण है, जिसमें थोड़ी मणिपुर में लागू आफ्सपा कानून की झलक (फिल्म का पहला सीन), थोड़ी मणिपुरी नृत्य की थाप, थोड़ा ‘पड़ा’ को ‘परा’ कहने वाली भाषा का माधुर्य और इन सबके केंद्र में सिमटा मैरी कॉम के संघर्ष और जज्बे का वो काढ़ा, जिसे बिना धोखे के किसी दर्शक को पिलाया ही नहीं जा सकता। इसका अहसास ही फिल्म का मूल है।

मैरी कॉम की कहानी को इस संदर्भ में याद करना भी बुरा नहीं होगा कि एक सफल महिला के पीछे कहीं न कहीं दो पुरुषों का हाथ भी है। मैरी के सफर की मुश्किलें मिटाने में उनके पति ओनलर और कोच ने भी कसर नहीं छोड़ी। मैरी कॉम नाम की यह गाड़ी स्त्री और पुरुष रूपी पहियों के संतुलन पर टिकी है। मनुष्य द्वारा रचे श्रेष्ठ कीर्तिमानों का यह भी एक महत्वपूर्ण आधार है।

किसी फिल्मकार को मैरी पर फिल्म बनाने का विचार सिर्फ यही सोचकर आ सकता है कि किस तरह एक महिला दो बच्चों की परवरिश करते हुए बॉक्सिंग रिंग पर विजयी अभिवादन करने में कामयाब हुई होगी। लेकिन किसी फिल्मकार के लिए इस फिल्म को बेचना उतना ही कठिन होता, जिनता कि यह सोचना सरल है। भारतीय िसनेमाई सौंदर्य के जनक संजय लीला भंसाली इन दोनों ही कला में पारंगत हंै।
साथ ही कोई दर्शक फेडरेशन के एथलीट्स के प्रति भेदभावपूर्ण और उनके सुविधाओं के नाम पर ठेंका दिखाने वाले रवैये पर विचार किए बिना भी नहीं रह सकता। हमारे खेल फेडरेशन्स की हकीकत सिर्फ फिल्म के इस एक संवाद में निहित है कि ‘पहले मेडल के लिए जिंदगी दांव पर लगाओ, फिर जिंदगी के लिए मेडल’।

प्रियंका चोपड़ा और उनके मेकअप आर्टिस्ट के हुनर की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम। इस फिल्म ने साबित किया है कि भले ही खेल फेडरेशन अपना धर्म भूल गए हों, लेकिन सिनेमा अपना धर्म नहीं भूला है।


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